बाकी सब बेमानी

सब खेल यहाँ, बातों के आकर्षण का
सम्मान से मिली अपनी स्वीकार्यता का
दिमाग फिर अस्थिर सा,डोले,डोले रहता है
अदने से दिल के आगे,बाकी सब बेमानी लगता है।
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जिस दिन अस्वीकार किया इस दुनिया ने
सच में विश्वास नहीं रहता इस दुनिया में
दिल असीम दुख के सागर में डूबा डूबा रहता है
तब दिमाग ही काम करे, बाकी सब बेमानी लगता है।

स्वीकार,अस्वीकार दो पलड़े जीवन के
कभी एक झुके, कभी दूजा हल्कापन आए
दिल, दिमाग के तराजू में तुलते रहते हैं
बातों के आगे, भावों का भाव बेमानी है।
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जाने कितने रिश्ते, धागे जैसे उलझ रहे
सुलझे ग़र, और रिश्ते भी बिगड़ रहे।
कुबूल है या नहीं सोचे बिन, जीवन में बढ़ते रहते हैं
रिश्तों के आगे,बातों का चुभना ,लगता सब बेमानी है।
अपर्णा शर्मा
Sept.20th,24

दिल में बसे शहर

शांत पड़े गहरे पोखर में आज हलचल मचती रही
यादों की कंकरी,पुरजोर आज शोर करती रही
जिन यादों को झील सा शांत समझ लिया था अपर्णा
उन यादों के बवंडर में ख़्यालों की सुनामी उठती रही।
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समय के साथ न जाने कब डगर बदलती रही
इसीके साथ मेरा जुनून और चाहत बदलती रही
जहन में शहर आज भी उसी जवानी में है
न जाने क्यूँ कर ये ख़्याल जीती रही।
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कभी शहर छूटने और जुड़ने की फिक्र न रही
छूटने की गमी,मिलने की खुशी की पैमाइश न रही
आज भी शहर का बसंत दिल में बसा है
छूटे हुए मोड़ देखने की कभी ख्वाहिश न रही
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ख़्यालों के चौराहों की हर गली आबाद रही
ख्वाबों के नुक्कड़ पर टपरी भी गुलजार रही
अपने अंदाज में आज भी यादों को संजोए हुए
हर बात दिल ही दिल में क्यूं बात करती रही।
अपर्णा शर्मा Sept. 13th,24

मैं जीना न छोड़ूंगा

जिस घर मैंने जन्म लिया
लाड़,प्यार और तकरार किया
उनको रोता कैसे छोडूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।

जिन गलियों में पतंग सा उड़ा
यारी,दोस्ती का इतिहास बना
उनको कैसे भूलूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।

भविष्य के उज्ज्वल होने में
दबाव बहुत हो मस्तिष्क में
नए विकल्प मैं खोजूगा
मैं जीना न छोडूंगा।

इंजीनियर,डॉक्टर ही जीवन नहीं
कोई काम छोटा समझूँगा नहीं
इक खिड़की मन की खोलूँगा
मैं जीना न छोड़ूंगा।

बेहतर भविष्य खुद बन जाएगा
ग़र बेहतर मनुष्य बन जाऊंगा
मैं पलायन न अपनाऊंगा
मैं जीना न छोडूंगा।
अपर्णा शर्मा
Sept.6th,24

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