सुबह तुम्हें याद कर शुरु होता जिसका दिन
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
इबादत में रोज ही माँगती तुम्हारी ख़ैर
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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खूबसूरती में चाँद सी चमक की चाहत
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
नेकीयों की अर्जियों में चाही तुम्हारी नेकी
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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सांसो के इस तराने में बजे तुम्हारी सरगम
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
वज़ूद खोया-खोया दिखे मुझे तुम्हारे बिन
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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मैं तो अपनी जानूँ, तुम्हारा तुम जानों
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
अपर्णा शर्मा
Nov.22nd,24
धुँआ-धुँआ
मना कर त्योहार रोशनी का
माहौल धुआँ-धुआँ हो गया
करके द्रुत आक्रमण तन पर
मन को बेहद बीमार कर गया।
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कुहासे और धुएँ का मिश्रण
धुन्ध बन कर पसर गया
सूरज की आस में हर कोई
एक किरण को तरस गया।
त्योहारों का मद माहौल जो
सभी का पोर-पोर भीगा गया
प्रदुषित होता हमारा पर्यावरण
स्वास्थ्य का पाठ भी पढ़ा गया।
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वो गुलाबी सर्दियों की लुभाती दस्तक
बीते दिनों की मायूस दास्ताँ बन गई
स्याह हुए परिवेश में फैला धुँआ
हर साल का सिलसिला बन गया।
अपर्णा शर्मा
Nov.15th,24
विरह
मैं भी अब मैं कहाँ रहा
तुम हो गया हूँ।
तुम्हारे साथ मैं भी
कहीं खो गया हूँ।
जहाँ तुम्हें देखता
फिर रहा
वहाँ अपने को
पा रहा हूँ।
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हर जगह तुम्हारी ही
छाप है
दिल ओ दिमाग में
तुम्हारा नाम है ।
इस दुनिया में
अजनबी अब
एक झलक को
तरस रहा हूँ।
अपर्णा शर्मा
Nov.8th,24
