चुगली ना करते गर दुनिया में
तो ख़बरों को दीमक लग जाती.
सब लाड-प्यार से रहते,आपस में
जिंदगी जैसे, निरस हो जाती।
मुश्किल होता,समय काटना
काया रोगी जैसी हो जाती.
बिन चुगली के, सोचो जरा
दुनिया रंग भरी ही रह जाती।
चुगली संक्रामक बीमारी सी
एक से दूजे को झट लग जाती.
सुन्दर,संवरी दुनिया को,सहसा ही
कितना बदरंग कर जाती।
सुर में सुर मिलाकर, निंदा करना
अद्भुत समां बाँधता हैं
समय भूलकर, इस निंदा राग में
अद्भुत ही आनंद आता है।
हास परिहास भरी चुगली
परिवेश को हल्का है करती
अफवाहों में लिपटी चुगली
दिलों में फासला है करती।
अपर्णा शर्मा
Dec.13th,24
प्रेम
खिले खिले से शोख रंग
लहराती, सिमटती तरंग
मन तितलियों सा बावरा
घुल जाए जब मीठी सुगंध।
आनंद का विस्तार है यहीं,
सच्चे प्रेम का सागर है यहीं।
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शिकवे,शिकायत हो जब धूमिल
अधरों पर स्मिता हो जब सात्विक
मौन की हो जब अनवरत वार्ता
यहीं रुप है प्रेम का आत्मिक।
आनंद का विस्तार है यहीं,
सच्चे प्रेम का सागर है यहीं।
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चाह बस हो, जब साथ की
हर कदम, हर एक साँस की
बेहिचक, तत्पर समर्पण को
बात हो चाहे प्रेम या भक्ति की।
आनंद का विस्तार है यहीं,
सच्चे प्रेम का सागर है यहीं।
अपर्णा शर्मा
Dec.6th,24
प्रथम प्रेम पत्र
बेहद दुष्कर् रहा, लिखना प्रथम प्रेम पत्र
लिखूँ, दीर्घ, भावुक या संक्षिप्त कुशल पत्र।
भावों को बयां करना, कभी न रहा इतना आसान
शब्द व्यंजना में, परिवर्तित हो जाते मन के ज़ज्बात।
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कठिन रहा, पत्र का चुनाव, लिखूँ, आसमानी पत्र
या तुमसा प्यारा,लिखूँ, गुलाब सा गुलाबी पत्र।
मसि का रंग भी चार दिन से अधिक सोचता रहा मैं
काली,नीली स्याही या अपने रक्त से उतार दूँ भाव मैं।
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तुम्हारे नाम को मुस्कान से सजा, मैं चित्रकार सा, रहा मगरूर
अंत में दिल अंकित कर,हार गया दिल, फिर न रहा जरा गरुर।
दिल से लिखे ये एहसास, क्या पहुँचे हैं कभी तुम तक?
ये भाव, दिल के डाकखाने में महफ़ूज़ है मेरे अभी तक।
अपर्णा शर्मा
Nov.29th,24
