आखिर

हर बार आवाज ने ओढ़ ली खामोशी की चादर
महत्वकांक्षा भी देता रहा संतोष को ही  सत्कार।
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कुछ इस तरह जिंदगी में आता रहा ठहराव का अतिभार
आखिर,
ठहराव ने फिर चुना आवाज को ही हथियार
अपर्णा शर्मा
March24th,2026

अनकही बातें

ज्यों ज्यों जिंदगी बढ़ रही
अकेलेपन को समझ रही
त्यों त्यों बहुत सी अनकही
अपनी अपनी ही कह रही।

कुछ बातें जो नुक्कड़ पर छोड़ी
कुछ बड़ी खूबसूरती से थी मोड़ी
अब सभी आवाज देकर बुलाती
आज भी वो उसी जगह थी ठहरी।
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अंधेरा और अकेलापन इन्हें खूब भाता
अनकहे किस्सों का डेरा जम ही जाता
वो लम्हा ,सुकून का पल दे कर
अनकहा संतुष्ट सा फिर नजर आता।

कभी महफ़िलों के बेहद शोर में 
कह दिए गर ये अनकहे किस्से
रूठ कर दूर बैठ जाते हैं ये हमसे
जैसे पराए हो गए हों अब किस्से।
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अनकहा कभी कभी चुभता है दिल में
एक मुलाकात का फासला रहता है दिल में
हो मुलाकात और कह दे सब अनकही बाते
ठिठक कर घर कर गई है जो मन में।
अपर्णा शर्मा
March 20th,2026

दो पंक्ति

आजकल विचार किसी कोने में छुप से गए हैं
कलम भी सच लिखने में झिझकती बहुत है।
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सच यह है, कि सच को पढ़ना,कोई आसान नहीं
लेकिन झूठ को सच सा लिखने में मुश्किल बहुत है।
अपर्णा शर्मा
March17th, 2026

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