खेल

मन के भाव,जब कलम लिख न सके
झूठ को लिखे और सच कह न सके।
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गुम हो भाव, दिशा,दशा और काल के भय से तब,सच झूठ के खेल में,इंसान जी न सके
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,24

मेरे राम

हर जन के मन में राम रमे
हर कण-कण में राम बसे।

शंभु सदा जपते हरि हरि
और हरि को भाता हरे-हरे।
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राम नाम है साँस-साँस में
आस बसी है राम-राम में।

जीवन का नाम राम-राम
मृत्यु पर भी राम -राम कहे।
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जीवन का सत्य राम-श्याम है
राम न बसते कभी झूठ-पाप में।

तन और मन में रखो राम अगर
मेरे राम मिलेंगे डगर डगर में
अपर्णा शर्मा
Jan.19th,24

खाली हाथ

जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उसके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा।
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जब छुटा कोई, लगा, खाली हाथ ही रहा
यूँ जिंदगी भर ऐसे ही हाथ मलता रहा।
अपर्णा शर्मा
Jan.16th,24

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