वृक्ष की पत्तियों से वार्ता

मेरे वज़ूद से,दूर हो कर,यहाँ-वहाँ तो,हो गए हों
मौसम के बेमौसम होते ही,बिखर से जो गए हो।

ये ना सोचना,तुम्हारा अलग होना वज़ूद खोना है
तुम्हारे निशाँ,मेरे होने का,सबब जो बन गए हैं
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पीले पत्ते ही अलग कर सकता है ये जालिम मौसम
नई कोपलों को रोके,वो मौसम कभी देखे नहीं गए हैं।

तुम्हारी शहादत को, मैं कभी भूल सकता ही नहीं
ऊँचाईयां हो,या फैलना तुम संग ही मैंने सब पाया है।

तुम अभी तक मेरे आस-पास,मेरी मिट्टी में हो पड़े
वज़ूद मुक्कमल से पहले,मेरे लिए,खाद भी बन गए हों।
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रे पत्तियों,तुम सिर्फ तने पर सजी ही,खूबसूरत दिखती नहीं

मिट्टी में रल कर,सदा सुंदर जीवन वनस्पति को देती रही हो।
अपर्णा शर्मा
Feb.2nd,24

गुल्लक

जब बैठेंगे,तसल्ली से, उम्र के आखिरी मुकाम पर
बेफिक्र रफ्तार-ए- जीस्त से रखे होंगे हाथ,हाथ पर
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खोलेंगे गुल्लक का ताला लगा कर यादों की चाबी
जी जाएगी जिंदगी फिर से,इस जमापूंजी को देख कर।
अपर्णा शर्मा
Jan.30th,24

*जीस्त: जिंदगी

अभिमान


पाँच तत्व से बना शरीर
बचपन से सुनता आया रे.
मिट्टी,अग्नि,जल,आकाश
वायु ने मिलकर बनाया रे.

ये तन माटी का पुतला तू
इस पर खूब इतराया रे.
दर्प की वायु भरली इतना
इसका घमंड ना उतरा रे.
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मैं की अग्नि में तूने
शरीर खूब ही तपाया रे.
मानवता को भस्म किया
अमानवता से जोड़ा नाता रे.

जल की शीतलता से तूने
तोड़ा क्यूँ नाता रे.
कठोरता के आंगन में तूने
अलग संसार बसाया रे.
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फूटा जब माटी का तन
जल में जल समाया रे.
दर्प वायु का ऐसा टूटा
अग्नि में तुझे जलाया रे.

सुन्दर, सद्कर्मों का नाता
बस आकाश में जाता रे.
इसी चक्र में घूमता मानव
जीवन यही बताता रे.
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सद्कर्मों को करके तू आत्मा से बन्ध जा रे.
आत्मा ही जायेगी वहाँ
मात्र सद्कर्मों की कीमत रे.
अपर्णा शर्मा
Jan.26th,24

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