जिद, वहीं अड़ी रही और उसी जगह पर खड़ी रही।
https://ae-pal.com/
आदतें लड़ी नहीं, बदलती रही और आगे बढ़ती रही।
अपर्णा शर्मा
March10th,26
रंगों के मौसम में
रंगों के इस मौसम में
अब रंग फीके से लगते हैं
फूलों के इस मौसम में
फूल भी कागज़ के दिखते हैं।
प्रेम रंग में डूबे इंसा
मुश्किल से ही दिखते है।
मानवता की बातें करने वाले
नफरत में डूबे रहते हैं।
https://ae-pal.com/
कच्चे रंगों के बाजारों में
पक्के रंग खो जाते हैं
रंगों पर दूजे रंग चढ़ते ही
पहले रंग धुंधले हो जाते हैं।
रंगों की बौछारों में भी
मन रीते ही रह जाते है
मन को उल्लासित कर दे
वो रंग बाजारों में न मिलते हैं।
अपर्णा शर्मा
March 6th,2026
दो पंक्ति
अंगारों पर बैठी दुनिया,एक दूजे को कमतर आंक रही।
https://ae-pal.com/
क्रूर होती दुनिया,अब मानवता को धिक्कार रही।
अपर्णा शर्मा
March 3rd,2026
