दस्तक

फिर दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी है

ख़्वाबों ने हक़ीक़त को आवाज़ दी है

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खुले रास्ते अब बढ़ते जाना सिखा रहे हैं

हम भी मंज़िल से बेफिक्र, चले जा रहे हैं। (अपर्णा शर्मा)

नदी सी ज़िंदगी

कभी संकरी, कभी सर्प सी रेंगती

दिखती रेतीली, बहुत ही पथरीली।

सूर्य का ताप जैसे अलंकृत हो रहा सोना

लीन न हो, आस का संकरा प्रवाह ।

कभी उफनती, सर्वस्व निगलती

भय युक्त कर, गाँव-गाँव समाती।

सब तटबंध तोड़, लील लेगा सैलाब

मानो आया प्रलय का अंतिम पड़ाव ।

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कभी अत्यंत मौन, पेड़ों की हवा, छाँव

कल-कल करती सुख का अद्भुत राग ।

असीम शांति, यही है, हाँ! यही मेरी चाह

अनंत रंगों से सजे हैं, आज धरती आसमाँ ।

सुबह शाम, शांत, घंटियों का अनहद

पक्षियों के नाद से गुंजित उन्मत्त मन ।

कभी पुष्प सी समर्पित है मेरी बंदगी

इस नदी के रूप सी है, मेरी ज़िंदगी ।(अपर्णा शर्मा)

काश

जब गम बढ़ जाए, आँखे नम हो जाए,

काश, तभी चुपके से बारिश हो जाए।

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न गम दिखे, न आँखे नम दिखे,

जिसे दिखे बारिश और बारिश दिखे। अपर्णा शर्मा(Nov.8th,22)

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