कुदरत

ज़िंदगी के सफ़र में यक से, अजनबी टकराते हैं

धीरे-धीरे दिल के क़रीब आ, अज़ीज़ बन जाते हैं।

बातों-मुलाक़ातों से शुरू, सारी दुनिया हो जाते है

हर ख़ुशी-ग़म में, उसे यूँही सब राबता कराते हैं।

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अज़ीज़ इतना कि उसके सिवा वजूद मंज़ूर नहीं

उसे भी दुनिया में कोई और शख़्स क़बूल नहीं।

अचानक वक़्त अपना कड़वा खेल, खेल जाता है

मामला कुछ नहीं और वो बीच रास्ता छोड़ जाता है।

इंसान है, सो खोना-पाना, मिलना-बिछड़ना क़बूल करता है

दर्द दिल में लिए, इसे ही क़ुदरत का उसूल मान लेता है।

इज़हार

जब शब्द मौन हो जाए,

तब आँखें बात करती है।

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सुप्त पड़ी सम्वेदना का ,

खुलकर इज़हार करती है।

उम्र

उम्र क्यों बिला वज़ह मजबूर कर रही

ज़िंदगी सदा से जीने की वज़ह दे रही।

उम्र जब देखो पाबंदी की बात करती है

ज़िंदगी वहीं पुरजोश जीना सिखाती है।

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यूँ न समझ, ए उम्र! के रुकावटें न थी रास्ते में

फिक्र को, तमाम कर गई ज़िंदगी अपनी हस्ती में।

जब अपना अक्स देखती है उम्र आईने में

उम्र शरमा जाती है, ज़िंदगी के मुस्कराने पे।

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