रिश्तों में कुछ तो है

हैरान है आज शायर,कि रिश्तों में कुछ तो है,जो पिघलता है
बहुत कुछ बाकी है दरमियाँ उनके, कि वो नाराजगी को तरसता है।
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कोशिशे हज़ारों, हजार करली कि अब कोई वास्ता न रहे
बात,मुलाकात अब बेशक नहीं, पर रिश्तों में आज भी तरलता है।
अपर्णा शर्मा
Oct.14th,25

ज़िंदगी रुकती नहीं

यूँ तो बहुत दिनों से चल रही थी तैयारियां
समेट कर रख ली थी अपनी लकुटी कमरिया
धीरे धीरे उम्र का तकाजा बढ़ाती रही बीमारियाँ
जी ली थी,फिर से उसी में,सारी नासमझियां।
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वालदैन का अपने ही बच्चों को वालदैन बनाना
जैसे फिर से  बचपन पर आकर ठहर जाना
जी कर पूरी ज़िंदगी ज्यूं हो दुनिया का चक्कर
और एक सुबह चुपके से अलविदा कर जाना।
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रुके हुए सब जज़्बातों का बह जाना
यादों का कसकर दिल से जकड़ जाना
ज़िंदगी ऐसे ही चलती वो रुकती नहीं
धीरे से,वो वज़ूद अपने में समा जाना।
अपर्णा शर्मा
Oct.10th, 25

पतझड़

शरद ऋतु के आते ही, रंग बरसाते वृक्षों को देखा
धीमे-धीमे फिर मौसम का मिजाज बदलते देखा।
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पतझड़ तो मौसम का फेरा, फिर वृक्षों को हरे होते देखा
जिस घर आया पतझड़, उस घर को खण्डहर होते देखा।
अपर्णा शर्मा
Oct.7th,25

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