समाज को शंकित करने पर
समाज के भयभीत होने पर
व्यक्ति जब-जब मौन हो जाए
तब निगाह ठहरती है लेखनी पर।
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देश के हर काल अकाल की
सैनिकों के प्रेम और शहादत की
गरीबों मजदूरों के बेबस दुःखों पर
मुखर आवाज होती तब लेखनी की।
बालकों पर नित होते दुर्व्यवहार को
नारी पर असीमित होते अत्याचार को
वृद्धों पर चिर निद्रा में सोते समाज पर
तेजधार लेखनी ही जगाती फिर समाज को।
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ग़र कभी लेखनी चापलूस हो जाए
झूठी शान में ग़र कभी भटक जाए
तब लेखनी समाज को गर्त में है डालती
माँ के आशीष सी कुछ लेखनी राह दिखा जाए।
अपर्णा शर्मा
Dec.1st,23
शब्दों की थिरकन
शब्दों में शब्द जोड़ते रहे
यहीं कविता है सोचते रहे
पर अभाव मिला जब भाव का
सारे शब्द निरर्थक हो रहे।
कभी भावों का देख बवंडर
गोते खाते रहे यूँ ही दिन भर
लिखने को जब उठाई कलम
भाव का बह गया शब्द समंदर।
वो क्षण भी चमत्कार से कम न होते
जब भाव मनमस्तिष्क पर उमड़ घुमड़ छाते
शब्द मेघ की घनघोर रिमझिम से
बंजर मनजमीं को भाव तृप्त कर जाते।
और फिर कलम भी गुनगुनाने लगती
शब्दों की थिरकन कागज़ पर नृत्य करती
हर भाव शब्द संग करता वादन
तब कहीं कविता अपना संगीत पूर्ण करती।
अपर्णा शर्मा
Nov.24th,23
हे पुरुष!
हे पुरुष!
बिन स्त्री तुम निरीह से
सदा अस्तित्व से परे
संबल बन सभी का
खुद को गवांते जा रहे।
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हे पुरुष!
अपने लिए भी जियो जरा
परवाह से तू क्यूँ कर डरा
सबके लिए जीता रहा सदा
जरूरत पर अपने करे किनारा।
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हे पुरुष!
सब कुछ कैसे सह लेता
अपनी पहचान खो देता
पुरुषत्व का कल्पित ताज
और भी बोझ बढ़ा देता।
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,23
( अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)
