धुँआ-धुँआ

मना कर त्योहार रोशनी का
माहौल धुआँ-धुआँ हो गया
करके द्रुत आक्रमण तन पर
मन को बेहद बीमार कर गया।
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कुहासे और धुएँ का मिश्रण
धुन्ध बन कर पसर गया
सूरज की आस में हर कोई
एक किरण को तरस गया।

त्योहारों का मद माहौल जो 
सभी का पोर-पोर भीगा गया
प्रदुषित होता हमारा पर्यावरण
स्वास्थ्य का पाठ भी पढ़ा गया।
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वो गुलाबी सर्दियों की लुभाती दस्तक
बीते दिनों की मायूस दास्ताँ बन गई
स्याह हुए परिवेश में फैला धुँआ 
हर साल का सिलसिला बन गया।
अपर्णा शर्मा

Nov.15th,24

विरह

मैं भी अब मैं कहाँ रहा
तुम हो गया हूँ।
तुम्हारे साथ मैं भी
कहीं खो गया हूँ।

जहाँ तुम्हें देखता
फिर रहा
वहाँ अपने को
पा रहा हूँ।
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हर जगह तुम्हारी ही
छाप है
दिल ओ दिमाग में
तुम्हारा नाम है ।

इस दुनिया में
अजनबी अब
एक झलक को
तरस रहा हूँ।
अपर्णा शर्मा
Nov.8th,24

बुजुर्ग : एक सम्मान

बालक में,बचपन भी, तब तक ही कायम है
जब तक उसके सर पर, माता पिता का साया है।
परिवार में कायम रहता, उनसे संस्कार का गहना है
जब तक परिवार में, बुजुर्गों की रहती महामाया है।
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बिन बुजुर्गों के घर,एक रात में बदलता है
जाने का दर्द ,बच्चों को क्षण में बूढ़ा करता है।
छोड़ के नखरे, कांधा जिम्मेदारी से झुकता है
अखखड़बाज़ी पर खामोशी का पहरा होता है।

बुजुर्ग और बुजुर्गीयत जीवन में, होना महंगा है
बूढ़ा होना,हमारे वज़ूद का प्यारा सा तमगा है।
बचपन और जवानी खोकर पाया यह सम्मान है
निराश गर हुए तो जीवन का भी यह अपमान है।
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मन से शिशु,बुद्धि में ऊर्जा, हो जैसे तरुणाई
तन की झुर्रियां,कहे जीवन की सारी सुघड़ाई।
ऐसा ग़र हम कर पाए तो बुढ़ापा जी जाए
अपने प्रियों के मध्य अमिट छाप लगा जाए।
अपर्णा शर्मा
Nov.1st,24

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