सोच

बेटे -बेटियाँ दोनों खुद के आशियाँ बसा लेते हैं
अपने -पराए से परे अपने आसमाँ खुद तलाशते हैं।

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दोनों के ही अपने बेहतरीन वज़ूद सदा से रहे हैं
अधिक और कमतर बस सोच के ही मामले हैं।

यादें बहुत सताती हैं

यूँ तो भूली सी रहती है
गुपचुप सोयी रहती है
किसी बात पर किसी काम पर
चुपके से डेरा जमाती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

दादी नानी के लाड़ प्यार में
दादा नाना के रौब दाब में
बचपन की हर कारस्तानी में
छुप कर बैठी रहती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

विद्यालय के कोने,कक्षों में
खेल के हर संगी साथी में
शैतानी की फुलझड़ियों में
रोज शाम को आती हैं
ये यादें बहुत सताती हैं।


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अल्हड़पन की मस्ती भरी
दैनिक दांवपेंच की खिलंदड़ी
कड़क चाय सी तृप्ति भरी
जीवन में रंग भर जाती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

युवा मन की जिम्मेदारी में
जीवन को सर्वोत्तम बनाने में
मित्रों, रिश्तों की खुशियों में
रोज ही पैर पसारती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

ख़्वाहिश

ख़्वाहिश, कभी अंगड़ाई, कभी परछाई, कभी मुस्कराती

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कभी पूरी, कभी अधूरी, कभी जिम्मेदारियों में कुनमुनाती।

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