होश संभालते ही, कुछ तस्वीरें बनी जेहन में
जिनमें रचा,पहाड़,झरने और चिड़िया बना मैं।
थोड़ी सी ज़मी, जहाँ बैठ कर रास्ते देख लूँ
थोड़ा सा आसमाँ,अपनी मंजिल ढूँढ लूँ।
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आसान सी सफर-ए-तस्वीर रखी दिल में
कठिन रही डगर-ए-तकदीर असल में।
लगातार मंजिल को उठते रहे कदम
घुमावदार रास्ते थकाते रहे कदम दर कदम।
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आसमाँ की ऊँचाई पर,मंजिल कर रही इंतजार
झुका और,चल दिया खड़ी सीधी चढ़ाई पर।
बस यहीं एक रास्ता लगा,जिंदगी के सफर का
सोचा मिली ग़र मंजिल,छू लूँगा दामन आसमाँ का।
अपर्णा शर्मा
Dec.20th,24
छोड़ चला
जाड़े की आधी रात में, वादों, सपनों में लिपटा
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यादें दे,गम छोड़ चला, एक साल फिर से बीता।
अपर्णा शर्मा
Dec.17th,24
चुगली
चुगली ना करते गर दुनिया में
तो ख़बरों को दीमक लग जाती.
सब लाड-प्यार से रहते,आपस में
जिंदगी जैसे, निरस हो जाती।
मुश्किल होता,समय काटना
काया रोगी जैसी हो जाती.
बिन चुगली के, सोचो जरा
दुनिया रंग भरी ही रह जाती।
चुगली संक्रामक बीमारी सी
एक से दूजे को झट लग जाती.
सुन्दर,संवरी दुनिया को,सहसा ही
कितना बदरंग कर जाती।
सुर में सुर मिलाकर, निंदा करना
अद्भुत समां बाँधता हैं
समय भूलकर, इस निंदा राग में
अद्भुत ही आनंद आता है।
हास परिहास भरी चुगली
परिवेश को हल्का है करती
अफवाहों में लिपटी चुगली
दिलों में फासला है करती।
अपर्णा शर्मा
Dec.13th,24
