ये ख़ामोशियां

अंदेशे का शिकार होती हैं  ख़ामोशियां
एक तरफा शिकायत होती है ख़ामोशियां
कहते हैं आते तूफ़ाँ की पहचान होती है ये
बड़े ज़ख्मों के लिए तैयार करती हैं ख़ामोशियां।
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इन्द्रधनुषी पुष्पों के उपवन सी प्रसन्नता से पहले
अनंत दुख के महा सागर में डुबोने के तुरंत पीछे
अक्सर ही अनचाही सी सर्वत्र पसर जाती है
न जाने कितना बोलती है ये ख़ामोशियां।
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हर कोने में घूम-घूमकर है बूड़बुड़ाती
शांत परिवेश में बेइंतिहा ही बतियाती
जीवन की बदलती हर करवट का अंदाजा देकर
बिन कहे सब कह जाती है ये ख़ामोशियां।
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महफ़िल का साथ ख़ामोशियां नहीं करती है पसंद
एकांत ही लगे श्रेष्ठ,जैसे से पुष्प में छिपा मकरंद
मन ही मन बात बना कर ये वाचाल खामोशी
मंज़िल की राह दिखा देती हैं ये  ख़ामोशियां।
अपर्णा शर्मा
July 5th,24

ख़ामोशियां

अंदेशे का शिकार होती हैं  ख़ामोशियां
एक तरफा शिकायत होती है ख़ामोशियां।
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कहते हैं आते तूफ़ाँ की पहचान होती है ये
बड़े ज़ख्मों के लिए तैयार करती हैं ख़ामोशियां।
अपर्णा शर्मा
July 2nd,24

गुलमोहर

उदास दिल को मनाने
मधुर पल को संजोने
करते हो जब तुम आलिंगन 
ऐ गुलमोहर! कैसे हो बहलाते ?
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प्रतिवर्ष स्वर्ण सा खरा तपकर
कुंदन सा तुम पोर-पोर खिलकर
शीतलता भी तुमसे मिले प्रेम तपिश में
ऐ गुलमोहर! कैसे चमकते हो चुप रह कर?

जब भी तुम्हारी छत्रछाया में होती खड़ी
बुन जाती है,प्रेम की अमिट मंजुल लड़ी
तुम भी बारिश से पत्रों में बरस बरस कर
ऐ गुलमोहर! कैसे बनाते हो यादो की सुनहरी घड़ी?
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शीत से हिम हुए सुप्त प्रेम को 
तुम्हीं बढ़ा जाते हो प्रेम ताप को
पुष्पपत्र झरते मानो प्रेम पत्रों के शब्द बिखर गए
ऐ गुलमोहर !कैसे समेटते हो हर लम्हे को ?
और मैं अपने वज़ूद में कहीं ढूँढती हूँ गुलमोहर को?
स्वरचित:
अपर्णा शर्मा  June 28th,24

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