खुशी

खुशियों की चाह में जोड़ ली दुनिया भर की वस्तुएँ
सुख को खोजा तो खाली मिले हर किसी के बटुएँ।
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किसी ने भौतिकता को सुख समझने की भूल कर दी
किसी ने खुशियाँ बाँट कर, कमा ली सुख की दुआएं।
अपर्णा शर्मा
Nov.26th,24

बेशक

सुबह तुम्हें याद कर शुरु होता जिसका दिन
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.

इबादत में रोज ही माँगती तुम्हारी ख़ैर
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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खूबसूरती में चाँद सी चमक की चाहत
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.

नेकीयों की अर्जियों में चाही तुम्हारी नेकी
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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सांसो के इस तराने में बजे तुम्हारी सरगम
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.

वज़ूद खोया-खोया दिखे मुझे तुम्हारे बिन
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
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मैं तो अपनी जानूँ, तुम्हारा तुम जानों
बेशक मुझे आज भी चाहत है तुमसे.
अपर्णा शर्मा
Nov.22nd,24

पुरुष होना…

उसे समझदार कह कर
छीन लिया उस से
दुलार, खिलौने और बचपन.

फिर समझदार कहा
दूर हो गया उस से
जिद,बेबाकी और अल्हड़पन.

समझदार होते ही
लिपट गई उस से
जिम्मेदारियां और खालीपन.
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,24

(अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)

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