एक ख़्याल

रिश्तों की चादर पर मोहब्बत के बेल बूटों को काढ़ लिया करों ।

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ख़ुशहाल मुस्तकबिल के लिए यादों का बक्सा भर लिया करों ।

अपर्णा शर्मा

16th May 23

मैं और मेरा अंतर्मन

एक दिन बातों बातों में ,
मैं कह बैठी कि मैं तो सच ही बोलती हूँ ।
और तुम?
वो बोला, तुम से सच,पर झूठ भी बोलता हूँ ।
मैं फिर बोली,झूठ नहीं बोला करते यह गलत है ।
‘कुछ सही गलत नहीं,सब समय के अनुरूप है’ वो मुस्कराया।
मुझे उसकी बात थोड़ी जची ।अपने पे हँसी ।

अपनी कहीं बातों से हो गया दूध का दूध ,पानी का पानी।

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माँ ने पूछा,जब कभी। कैसी हो?
जवाब होता बहुत अच्छी।

पिता पूछते कि कोई परेशानी?
मैंने कहा, ना

भाई ने पूछा,मेरी याद आयी ?
जवाब था, क्यों आएगी ?

बहन का कभी यह कह देना
हमारा साथ कैसा बढ़िया था।
मेरा जवाब होता, हाँ बढ़िया था,पर अब याद नहीं।

दोस्तों ने पूछा, हमारे साथ की गई मस्ती ।
पूरा दिन की धमाचौकड़ी जिससे हैरान थी बस्ती।
अरे!वो पागलपन के दिन ।
कौन याद रखेगा वो पलछिन ।

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इसी तरह ना जाने कितने झूठ बोलती हूँ।
फिर भी मुस्करा कर कहती हूँ कि मैं सच बोलती हूँ।

अभी भी मैं हूँ ,ज्यादा सच्ची पर थोड़ी सी झूठी।

दिल की दास्तान



दिल के किसी कोने में महफ़ूज़ उसकी बातें,यादें मुलाकातें.
वो बिना ओर छोर की लगातार बातें, यादगार मुलाकातें.

अपने ही रंग तरंग में डूब लहराती, मचलती सी गुफ़्तगू.
मेरे हर सवाल को लाजवाब सा जवाब देती गुफ़्तगू.

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नजरो का नज़र से मिलने पर नजर चुरा कर देखती नज़रे.
पास आते ही रास्ता बदल दूर तक पीछा करती नज़रे.

सूखे फूल,तीन पत्ती, काग़ज़ के पीले पन्ने है जिंदगी की यादें.
खजाना खूब है पाया मोहब्बत में खो कर मिली है दर्द सी यादें.
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शरारतों से भरे दिन,एक चुप्पी को समझ बैठते थे
मुलाकातें.
पास से गुज़रे,जमघट में कभी उठते-बैठते, यही थी मुलाकातें.

सात पर्दों में छिपी, महफूज रखी है मैंने दास्तान.
मुमकिन नहीं पर यहीं है मोहब्बत से रीते दिल की दास्तान.

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