हम मीत

आँसुओं को सिर्फ़ अपनों के लिए पी लीजिए

मुस्कान को खुलकर ज़माने में बिखेर दीजिए।

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गर मिले कोई सच्चा हम-मीत ज़िंदगी के सफ़र में

तो कांधे पर सर रखकर आँसू भी बहा दीजिए।

इज़हार

जब शब्द मौन हो जाए,

तब आँखें बात करती है।

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सुप्त पड़ी सम्वेदना का ,

खुलकर इज़हार करती है।

दस्तक

फिर दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी है

ख़्वाबों ने हक़ीक़त को आवाज़ दी है

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खुले रास्ते अब बढ़ते जाना सिखा रहे हैं

हम भी मंज़िल से बेफिक्र, चले जा रहे हैं। (अपर्णा शर्मा)

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