इंतजार की घड़ी से जार जार होकर
आँखे थक गई कब से बेजार होकर ।
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खुद_ब-खुद जब ख्वाबों से हुई गुफ़्तगू
पलकें झुक गई ख्वाब को सच समझ कर।
अपर्णा शर्मा
June 10th,2026
दो पंक्ति
जब कि युद्ध का अंत, वार्तालाप में ही है।
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तब भी वार्तालाप से पहले,युद्ध ही है।
अपर्णा शर्मा
April8th,2026
दो पंक्ति
श्रेष्ठ दिखने की चाह में सरलता खोती रही
सरलता के साथ ही,सत्यता भी धुँधलाती रही।
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इस प्रचलन पर सवाल सा उठता है बहुधा
श्रेष्ठता के बोझ तले मनुष्यता ही अब खो रही। अपर्णाशर्मा March 31st
