खनकती चूड़ियां

सूरज के उगने से पहले
चिड़ियों के कलरव से पहले
उठ जाती,माँ के हाथों की चूड़ियां
खूब खनकती चूड़ियां।
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घर के हर कोने-कोने में
हर काम के पूरे होने में
माँ की हर आहट पर
खूब खनकती चूड़ियां।

छन छन कर गीत सुनाती
भोजन में स्नेह रस मिलाती
मधुर आवाज की तान सी
खूब खनकती चूड़ियां।
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भगिनी के हाथों में अल्हड़पन सी
भाभी के हाथों में मर्यादित सी
माँ की ममता से भरी भरी
खूब खनकती चूड़ियां।

श्रृंगार चूड़ी बिन रहे,सदा अधूरा
जैसे बिन बासंती, बसंत हो बौरा
रंग बिरंगी काँच की नाजुक
प्रेम चिन्ह है ये चूड़ियां।
अपर्णा शर्मा
April 4th,2026

शब्दों का उपवन

शब्दों के मनहर उपवन में
जब पुष्प खिले हो भावों के
छंदो के कोमल वृअंतों पर
तब अर्थ हिलोरें लेते हैं।

भीगे अंतस जब मधुरस से
पोर पोर तक युवा रचना से
ताजापन बिखरे छंद छंद पर
शब्द संयोजन झोंके लेते है।
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कभी-कभी तीखे कन्टक से
हृदय में धँसते जो शूलों से
वो नागफनी से है, बगीचे में
जो उत्तम पाठ पढ़ाते हैं।

कोमल,कोमल, छितरे, छितरे
शब्द उपवन में बिखरे,बिखरे
अमलतास सी रचना बनकर
शब्द उपवन को रोशन करते हैं।
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ऐसे ही शैली के पारंगत कवि
अपनी रचनाओं की लेकर छवि
गीतों को दिल तक पहुंचाकर
शब्द उपवन में महका करते हैं।
अपर्णा शर्मा
March27th,2026

अनकही बातें

ज्यों ज्यों जिंदगी बढ़ रही
अकेलेपन को समझ रही
त्यों त्यों बहुत सी अनकही
अपनी अपनी ही कह रही।

कुछ बातें जो नुक्कड़ पर छोड़ी
कुछ बड़ी खूबसूरती से थी मोड़ी
अब सभी आवाज देकर बुलाती
आज भी वो उसी जगह थी ठहरी।
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अंधेरा और अकेलापन इन्हें खूब भाता
अनकहे किस्सों का डेरा जम ही जाता
वो लम्हा ,सुकून का पल दे कर
अनकहा संतुष्ट सा फिर नजर आता।

कभी महफ़िलों के बेहद शोर में 
कह दिए गर ये अनकहे किस्से
रूठ कर दूर बैठ जाते हैं ये हमसे
जैसे पराए हो गए हों अब किस्से।
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अनकहा कभी कभी चुभता है दिल में
एक मुलाकात का फासला रहता है दिल में
हो मुलाकात और कह दे सब अनकही बाते
ठिठक कर घर कर गई है जो मन में।
अपर्णा शर्मा
March 20th,2026

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