उठो, चलो, थोड़ा खुद के लिए भी जी जाओ
बाहर निकलो, थोड़ा रुबरु दुनिया से हो जाओ।
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जिम्मेदारी निभाते,निभाते, जीवन की साँझ आई
आओ,अब इस साँझ का उत्सव तुम मनाओ ।
अपर्णा शर्मा
Dec.9th,25
दादी ( शादियों के मौसम में)
सुनते ही,पौत्री के विवाह का शुभ समाचार
दादी के मासूम बूढ़े चेहरे पर खिल गई मुस्कान।
पौत्री के सर पर वार फ़ेर कर रही
नज़र उतारे और कभी बलैया ले रही।
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ना जाने बक्सा में दादी क्या उलट-पलट रही.
लाल रंग का कश्मीरी शॉल उपहार दे रही।
सीखों की पोथी भी दी है संग इसमें
सदैव यहीं तो साथ देंगी जीवन में।
सभी नेग चार पर दादी की पैनी नजर
भूल चूक ना हो, रखी है सबकी खबर।
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प्रति रात जब ढोलक पर थाप लगती
बन्नी गाते-गाते खुद भी ठुमक लगाती।
माँ से थोड़ी बढ़ कर प्यारी होती है दादी
हमारे हर राज की हमराज होती है दादी।
दादी बिन सूना लगता माँ का अंगना
सच हैं कि तुम बिन जिया जाए ना।
अपर्णा शर्मा
Dec.5th,25

मामा (शादियों के मौसम में )
मामा के आगमन से, चूहूँ ओर है हर्ष की बेला
मायके का लाडला,आज मेहमान बना अलबेला।
भाइयों की हो रही द्वार पर अगवानी
मंगल गीतों के संग उतर रही आरती।
मामा के आते ही माँ को भूला दूल्हा
मामा मामा करते मामा पीछे डोला।
घुड़चढ़ी की पोशाक सब ही मामा लाया
जिसे पहन दूल्हा, मन ही मन इठलाया।
घोड़ी पर जब मामा ने दूल्हा बैठाया
गर्व से तन कर मामा भी थोड़ा इतराया।
नजर ना लगे राजा से दूल्हे को
रुपये लुटाता जा रहा वार फेर को।
बिन मामा,बिन भात,शादी लागे सुनी
प्रथम निमंत्रण बहना भाती को ही देती।
अपर्णा शर्मा
Nov.28th,25
(शादियों के मौसम में पुरानी रचना)

