जिंदगी खर्च करके,उसके हाथ बस उमर रह गई
क्या खोया,क्या पाया, दिल में यहीं कसक रह गई।
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किश्तों सा खर्च करा था,जिंदगी के हर लम्हे को
उमर का पुलिंदा थमाकर,जिंदगी हिसाब कर गई।
अपर्णा शर्मा
Dec.30th,25
नदी और समंदर
पितृ गृह से जब इक धारा संकरी चल कर आई
वन,उपवन,हिम पर्वतों से हुई उसकी यूँ विदाई
अनजानी मंजिल है उसकी और अपरिचित सी राह
दूर समंदर तकता रस्ता और आंखों में रौनक छाई।
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बूँद बूँद रिसती,है वो दुर्बल,निर्बल धारा
ऊंचे नीचे रस्ते,नपे-तुले पग धरती धारा
जाने कब अल्हड़पन इसमें भर आया है
दूर समंदर उसके इंतजार में जीता अपना जीवन सारा।
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लिखे गए अनंत गीत,नदियों के संघर्षों पर
मीठापन मिट जाने के, गृह के विछोह दर्दों पर
प्रकट नहीं कर पाया समंदर कभी अपने एहसासों को
लेकर लांछन खारेपन का,जीता है अनंत आस पर।
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,25
होशियारी
जब तलक, रखे था वो,अपना सादा मिजाज
छला जाता रहा,वो, हर वक़्त, हर एहसास।
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सीख लेता गर वो,ज़माने की जरा भी होशियारी
जिंदगी में आ जाता उसके सुकून भरा इत्मिनान।
अपर्णा शर्मा
Dec.23rd,25
