मुस्कराते चेहरे पर
आँखों में नमी
मचलते कदमों पर
पंख सी उड़ान है
प्रथम प्रेम.
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उमस भरी गर्मी में
मन मानो शरबती
खसखस पर पानी की
ठंडी बयार है
प्रथम प्रेम.
अंधेरी घनेरी रातों में
ओस का मधुर स्पर्श
दुग्ध सी श्वेत चांदनी का
उज्ज्वल प्रकाश है
प्रथम प्रेम.
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जल सा निर्मल
काँच सा पारदर्शी
नदी की बहती
शुभ्र धारा है
प्रथम प्रेम.
पुकार उस नाम की
जो कभी कहीं चौका दे
रोए रोए में बसी वो
सिहरन है
प्रथम प्रेम.
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ईश्वर सा मान कर
साँसों में स्थापित
जीवन की अविरल
आत्मा है
प्रथम प्रेम.
अपर्णा शर्मा June21st,24
निरर्थक
जीवन कुम्भ की बूंद-बूंद को
जिसने घर को समर्पित कर दिया
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कैसे, क्यूं, कब हुआ वो निरर्थक ?
जिसने हरेक को समर्थ बना दिया।
अपर्णा शर्मा
June 18th,24
तजुर्बा
धुँधला गई थी जो लकीरें
वक़्त बदलते ही गहरा गई
मुलाकात होते ही उनसे
सब शिकायतें धरी रह गई .
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वक़्त की चादर ने ओढ़ी थी
जो आज से मूँद कर आँखे
वक़्त का कमाल तो देखो जरा
उसी चादर पर कसीदे निकाल रही.
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हालात से मजबूर हो कर
बंद करदी थी जो वक़्त ने किताबे
वक़्त के सही और सही होते ही
खुली किताब सी सारी पढ़ी जा रही.
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वक़्त के सितम देखो,चेहरे पर
लकीरों से खिंचते चले गए
वक़्त की मेहरबानी रहनुमा पर
ऐसी रही कि उसे तजुर्बा नाम दे रही.
अपर्णा शर्मा
June14th,24
