प्रेम से खूब सँवारे थे
ख़यालों से सहेजे थे
सब ने पोषित किए
मोहब्बत के रिश्ते थे.
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प्रेम के बीज़ बो कर
लता सा मिला आकार
इक दूजे के गलबहियां
बीत रहा समय संसार.
क्षण के सोच का असर
छा गया फिर इस कदर
छन से टूट गया रिश्ता
बिखरा काँच सा इधर-उधर.
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रिश्ता रुसवा हो गया
काँच दिल में चुभता गया
समय पर न सचेतना
रिश्ते को दाग दे गया.
अपर्णा शर्मा
April 19th,24
एकाकीपन
अपना सब कुछ सहर्ष लुटा कर,संतानो को हर हाल में जिता कर
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अपने समूचे वज़ूद को खोकर,निनिर्मेष से हैं,अपने घर में पराए होकर.
अपर्णा शर्मा April16th, 24
मेरी परछाई
सूरज के चढ़ते ही वो
मेरे संग संग हो लेती है
जहाँ-जहाँ मैं चलूँ वो
मेरे आगे पीछे ही रहती है.
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मेरे हर एक काम में वो
रखती साझेदारी है
साथ छूटे, चाहे सबका
वो रखती वफ़ादारी है.
मेरे अक्स में नानी,माँ सी
वो अक्सर मिल जाती है
और कभी मेरे प्यारे नन्हों में
मुझको झांसा दे जाती है.
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पर ये केवल प्यार अनुराग की
रोशनी में ही जीवित रहती है
घृणा, द्वेष के घोर अंधियारे में
परछाई न जीवित रहती है.
स्वरचित :
अपर्णा शर्मा April 12th,24
