दीवारें

जमीन के खिसकते ही
छत खुद ब खुद छिनते ही
ठौर जब कोई नहीं रहा
जिंदगी दीवारों के आसरे रही।
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संकुचित मन के विस्तार से
स्व से स्वार्थ तक के प्रसार से
आघात में अन्तर जब दरकता
हल निकलता तब दीवार से।

जानती पहचानती है करीब से
हर्ष और वेदना को समीप से
अपने में ज़ब्त कर सभी राज
दीवार भीगती स्वयं आँसुओं से।
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धैर्य की धनी सदा से रही
चुप सब कुछ सुनती रही
मौन उसका टूटता नहीं
दीवार कुछ कहती नहीं।
अपर्णा शर्मा
August 4th, 23

जीस्त

मजबूरियाँ किनारे पर ठहर गई
एहसास ए सुकून जब मिला।
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जश्न ए बहार सी जीस्त मिल गई
वफा ए समंदर आ मिला।
(जीस्त- जिंदगी)
अपर्णा शर्मा
August 1st, 23

सितारे

जब सितारे टूटते है
किसी को खूब भाते है
बंद कर नयन वो अपने
इच्छा को बुदबुदाते है।
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वैज्ञानिक देख कर टूटते सितारे को
जानते इसके भौगोलिक कारण को
सभी गति और समय के समीकरण लगा
ढूँढ ही लेते ,धरती पर सितारे के प्रभाव को।

कहीं गांव में जब ये सितारे है टूटते
धक से दिल की धड़कन को रोकते
पसीने में तरबतर शरीर,अनहोनी की फिक्र
माँ है वो सैनिक की, सलामती को हाथ उठते।
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हर किसी के लिए, सितारों का टूटना
कहीं खुशी की बात,कही दिल का दहलना
ऐसा है आकाश में टंके सितारों का सफर
जैसे हर पल किसी कहानी का बदलना।
अपर्णा शर्मा
July 28th, 23

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