इक मासूम चेहरा ईश्वर प्रदत
उसपर सजे मुखौटे अनगिनत।
कभी सत्य का, कभी असत्य का
कभी प्रेम का और कभी छल का।
https://ae-pal.com/
जब जिस मुखौटे से काम निकले.
वहीं मुखौटा ठाठ से मुख पे चमके।
यदि दुनिया परिचित हुई,इस कला की
विषादिता ही सिर्फ मित्र है ऐसे इंसान की।
https://ae-pal.com/
स्वयं सदा वास्तविक रूप में ही रहिए
मुखौटावानों को पहचानते ही सतर्क होइए।
अपर्णा शर्मा
19th May 23
एक ख़्याल
रिश्तों की चादर पर मोहब्बत के बेल बूटों को काढ़ लिया करों ।
https://ae-pal.com/
ख़ुशहाल मुस्तकबिल के लिए यादों का बक्सा भर लिया करों ।
अपर्णा शर्मा
16th May 23
नई शुरुआत
जब अंतस तक गहराता तम,वाह्य परिवेश में छा जाए.
चहुँ ओर विषाद से घिरा मन,अस्तित्व को लील जाए.
आस बंधा कर,अपने मार्ग के अवरोधों को दुनिया गिनाए.
भीतर-भीतर दुनिया के ये कथ्य,अस्तित्व पर भीतरघात कर जाए.
https://ae-pal.com/
डूबे से अंतःकरण में, जब पुकार उठे स्वयं के नाम की.
दूर एकांत में जरूर सुनो,तब बात अपने मान-सम्मान की.
स्वयं से वार्ता, चिंता सब हर कर, चिंता धुंधली कर देती है.
चित्त में विश्वास की,ढीली होती जड़ों को,फिर से कस देती है.
https://ae-pal.com/
तब विश्वास से भर कर, दुनिया की नए सिरे से परिगणना होती है.
अवरोधित जीवन यात्रा में,नए मार्ग की नई शुरुआत होती है.
अपर्णा शर्मा 12.5 23
