ख़्वाहिश

ख़्वाहिश, कभी अंगड़ाई, कभी परछाई, कभी मुस्कराती

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कभी पूरी, कभी अधूरी, कभी जिम्मेदारियों में कुनमुनाती।

कोशिश

अनंत तक, कोशिशें जारी रहे, कि द्वेष भाव, स्नेह बन जाए।

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अंत तक, कोई कोशिश न हो, कि प्रीत भाव, बैर बन जाए।।

हर्फ

जिल्द किताबों की, बदलने से क्या फायदा

बदलता नहीं कभी, किसी हर्फ़ का मायना।

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