समझ ज्यों बढ़ती गई,
मासूमियत खोती रही.
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मुकाम पार करती गई
जिंदगी तमाम होती रही.
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,23
समझ ज्यों बढ़ती गई,
मासूमियत खोती रही.
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मुकाम पार करती गई
जिंदगी तमाम होती रही.
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,23
ऐसा कोई पैमाना भी नहीं
जो प्रेम को तौले सही सही
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समय ही मात्र उपाय इसका
और कोई मूल्यांकन नहीं.
अपर्णा शर्मा
Dec.19th,23
जीवन के सफर में आते कई पड़ाव
कभी आशा भरी होती सुर्ख उजास।
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ऊँचाईयां छूता मध्याह्न जीवन का
फिर शीतलता दे जाती जीवन में साँझ।
अपर्णा शर्मा
Oct.10th,23