खेल

मन के भाव,जब कलम लिख न सके
झूठ को लिखे और सच कह न सके।
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गुम हो भाव, दिशा,दशा और काल के भय से तब,सच झूठ के खेल में,इंसान जी न सके
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,24

खाली हाथ

जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उसके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा।
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जब छुटा कोई, लगा, खाली हाथ ही रहा
यूँ जिंदगी भर ऐसे ही हाथ मलता रहा।
अपर्णा शर्मा
Jan.16th,24

कैलेंडर

कुछ ख्वाहिशें,जो ख्वाब थी ,बन गई
उस ख्वाब को अब फिर हौसला दे गई
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बारह मास के इस तारीख-ए-गुच्छ में
उम्मीद की रोशनी फिर दीदार दे गई.
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,24

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