गर्मियों की छुट्टियों से लौट कर तनीषा पुनः यथा स्थान सामान को व्यवस्थित करने में लगी है. आते ही सर्वप्रथम उसने खाने पीने का सामान अचार,पापड़, कचरी, अपने खेत की दाल, चावल, बाग के आम आदि आदि रसोई में रखा. तत्पश्चात, तनीषा ने कपड़ों की अटैची भी खाली करी. इस सब में तनीषा काफी थक चुकी थी. अब मात्र एक बैग खाली करने से रह गया था. वह उसे भी खोल कर देखने लगती है.
उस में तनीषा का प्रसाधन का सामान,मोबाइल का चार्जर, ईयरफोन जैसे अट्टरम सट्टरम भरा है, तभी उसकी नजर बैग में रखे बड़े से डिब्बे पर जाती है वह सब सामान को छोड़ कर उस डिब्बे को जल्दी से निकालती है और मन ही मन बोलती है बस सब ठीक-ठाक हो.
तभी उसका पुत्र प्रथम भी आ जाता है. वो डिब्बे की ओर इशारा करते हुए कहता है,” मम्मा! इसमें क्या है?” तनीषा कहती है, ” बेटा! इसमें मेरी प्रेरणा, मेरे घर की धरोहर है.” वह डिब्बे में से निकाल कर प्रथम को दिखाते हुए बोलती है. इसे लालटेन कहते हैं. प्रथम उसे देखते ही कहता है, “ये कैसी धरोहर है मम्मा, बिल्कुल कबाड़ है.” तनीषा प्रथम का चेहरा देखती रह जाती है और कहती है, हाँ! पहले मैं भी ऐसा ही सोचती थी.
आगे तनीषा कहती हैं कि प्रथम बेटा जब मैं पढ़ा करती थी तब एक बार मैं परीक्षाओं के पश्चात,अपने गांव दादी के पास गई. चूँकि मैं शहर से गई थी वहाँ विद्युत व्यवस्था सुचारू रुप से थी. दूसरी ओर, गांव में विद्युत एक सप्ताह दिन में नौ से पाँच और एक सप्ताह रात के नौ से पाँच आती थी यानि कि शाम में कभी भी विद्युत नहीं होती थी. एक दिन दादी किसी के घर गई थी जहाँ उन्हें देर हो गई, जब लौट कर आई तो घर में अंधेरा था.
दादी ने तनीषा से कहा, बेटा! तुमने लालटेन नहीं जलाई. छोटी तनीषा ने कहा मैंने कोशिश की थी परंतु मुझे लालटेन जलानी नहीं आई. तब दादी ने लालटेन का लिवर नीचे किया जिससे लालटेन का शीशा ऊपर हो गया और लालटेन जला दी. ये सब करते हुए दादी ने तनीषा से पूछा, “बेटा! अगर शहर में विद्युत न होती तो तुम कैसे पढती?” तब छोटी तनीषा कहती है दादी लालटेन रोशनी के लिए ठीक है पर पढ़ने के लिए नहीं.
दादी बात को आगे बढ़ाती हुई कहती हैं कि तुम्हारा पापा तो इसमे ही पढ़ा है. तब तनीषा कंधे उचका कर कहती है कि क्या पापा दिन में नहीं पढ़ सकते थे? दादी कहती हैं, बेटा! तब जीवन आज की तरह सुगम नहीं था. प्रत्येक कार्य संघर्ष और जटिलता से भरा था. विद्यालय हेतु सुबह तड़के ही निकलना होता था. प्राईमरी स्कूल गांव में थे परंतु जूनियर स्कूल प्रत्येक तीन किलोमीटर पर था. स्कूल से लौटते-लौटते शाम हो जाती थी फिर थोड़ा सा आराम और तत्पश्चात बाबा के काम में हाथ बटाना. इस सब में रात हो जाती थी और मेरी रानी बिटिया ये तो तुम अच्छे से जानती हो कि अव्वल आने के लिए अतिरिक्त परिश्रम करना होता है. तुम्हारा पापा शाम को ही लालटेन दुरुस्त कर लेता था. उसके परिश्रम के कारण आज हम सुगमता पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
प्रथम यह सब सुनते सुनते अपनी माँ के हाथ से लालटेन ले लेता है और कहता है कि मम्मा वास्तव में यह एक अनोखा और अमूल्य धरोहर है जो नाना जी के जीवन संघर्ष का साक्षी है. अब मैं इसे स्वयं साफ़ करके घर में सजाऊंगा और प्रत्येक दीपावली पर लालटेन की रोशनी भी किया करेंगे.
अपर्णा शर्मा July 24th,2026
