जीवन अपनों की परवाह में अपना न रहा
अपनों के लिए,अपने को खोता चला गया।
सभी का ख़्याल उसे हर वक़्त ही रहा
उनके ख़्याल में अपना ख़्याल खोता गया।
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सभी को परिवार में साथ रहने के गुण सिखा
न जाने क्यों वो खुद अकेला, तन्हा हो गया।
अपने शौक़ भुला,सभी के शौक रखे जिंदा
अपने जीने के ढंग छोड़,अब शोक में खो गया।
सभी की दिनचर्या को रफ्तार दे कर
उसका जीवन बुत सा स्थिर हो गया।
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ताउम्र फिक्र उसे रहीं,सभी के समुचित विस्तार की
और अपने को इस तरह संकुचित करता गया।
जो उम्र भर सभी को हर तरह से संभालता रहा
वो उम्र के इस पड़ाव पर हर किसी पर निर्भर हो गया।
अपर्णा शर्मा
Sept.21st,25
(अल्जाईमर दिवस पर )
वक़्त के संग
जब वक़्त संग मेरे चलता रहा
मंद चाल सा वो संग चलता रहा
बेफिक्र, बेपरवाह रहा जिंदगी से
उसके आगोश में बेसुध ही रहा।
कभी जो वक़्त, बेवक्त ठहर गया
मानो जीवन बर्फ सा जम ही गया
जिंदगी के वो बेइंतहा भारी पल
तब वक़्त भी उन पलों में सहम गया।
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ये वक़्त कभी सरपट चाल चल गया
मैं जो रुक कर, थोड़ा सुस्ता जो गया
ये फिर से,संग में चला,बड़ी खुशामद से
इस तरह मुझे अपनी कीमत सिखा गया।
हैरान हो! मैंने पूछा,एकदिन वक़्त से
तू यूँ, हरक्षण, भागता है किस से
तू है कौन? बदलता है क्यूं हर पल
बोला,ये जो जिंदगी है,है सिर्फ वक़्त से।
अपर्णा शर्मा
Sept.12th,25
तृष्णा
तृष्णा ऐसी प्यारी थी
आज पर हुई भारी थी
हिमालय सब देख रहा
मानवता आज हारी थी।
प्रदूषण फैला चारों ओर
कंक्रीट का जंगल घनघोर
पतली सी धारा नदियों की
पर्यटक करते विकट शोर।
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यक से मौसम ऐसे बदला
मानव पल भर में ठिठका
काल उगलती नदिया देखी
उत्थान को यूँ मिटते देखा।
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पर्वतों में अब बादल फट रहे
मैदान ताल तलैइया बन रहे
अब तो कुछ समझ बढ़ाओ
हम अपनी ही हानि कर रहे।
स्वरचित:
अपर्णा शर्मा
Sept. 5th,25
