कुदरत

ज़िंदगी के सफ़र में यक से, अजनबी टकराते हैं

धीरे-धीरे दिल के क़रीब आ, अज़ीज़ बन जाते हैं।

बातों-मुलाक़ातों से शुरू, सारी दुनिया हो जाते है

हर ख़ुशी-ग़म में, उसे यूँही सब राबता कराते हैं।

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अज़ीज़ इतना कि उसके सिवा वजूद मंज़ूर नहीं

उसे भी दुनिया में कोई और शख़्स क़बूल नहीं।

अचानक वक़्त अपना कड़वा खेल, खेल जाता है

मामला कुछ नहीं और वो बीच रास्ता छोड़ जाता है।

इंसान है, सो खोना-पाना, मिलना-बिछड़ना क़बूल करता है

दर्द दिल में लिए, इसे ही क़ुदरत का उसूल मान लेता है।

नदी सी ज़िंदगी

कभी संकरी, कभी सर्प सी रेंगती

दिखती रेतीली, बहुत ही पथरीली।

सूर्य का ताप जैसे अलंकृत हो रहा सोना

लीन न हो, आस का संकरा प्रवाह ।

कभी उफनती, सर्वस्व निगलती

भय युक्त कर, गाँव-गाँव समाती।

सब तटबंध तोड़, लील लेगा सैलाब

मानो आया प्रलय का अंतिम पड़ाव ।

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कभी अत्यंत मौन, पेड़ों की हवा, छाँव

कल-कल करती सुख का अद्भुत राग ।

असीम शांति, यही है, हाँ! यही मेरी चाह

अनंत रंगों से सजे हैं, आज धरती आसमाँ ।

सुबह शाम, शांत, घंटियों का अनहद

पक्षियों के नाद से गुंजित उन्मत्त मन ।

कभी पुष्प सी समर्पित है मेरी बंदगी

इस नदी के रूप सी है, मेरी ज़िंदगी ।(अपर्णा शर्मा)

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