मूल भाव

पुष्प, शाख,पात सभी सर्द से जड़ हुए शिशिर में
फिर खिलेंगे, महक ही पहचान बनेगी बसंत में।

हिम हुआ हिमालय,आदित्य के वियोग में
फिर प्रवाह बढ़ेगा, प्रकाश की वृद्धि में
https://ae-pal.com/
जुदा हो गया दोस्त, जो बसा था उसके जिगर में
पर दोस्ती आज भी जिंदा है,उसकी हर फ़िकर में।

समय के सैलाब में खो दिया, उसने अपने महबूब को
मोहब्बत पर नाज़ कर, मानता है वो हर उसूल को।
https://ae-pal.com/
कभी-कभी बदल जाते हैं, व्यवहार रिश्तों में
नहीं बदलता पर, मूल भाव किसी रिश्ते में।
अपर्णा शर्मा
Jan.9th,2026

चोट

बचपन को खेल-कूद में जी गए
कितनी ही चोटें, रोकर भूल गए।

कभी खेल के उत्साह में आगे बढ़ गए
कभी अकेले रोने के डर से चुप हो गए।
https://ae-pal.com/
तमाम झमेलों के संग खाई जवानी में चोटें
दिल पर लगी चोटों पर, अकेले में रोते।

कामयाब, नाकामयाब के हजारों ही मसले
दिल में कसक बन, घाव आज भी रिसते।

शरीर पर गहनों से सजे है आज भी चोटों के निशान
कुछ दिलों पर चोट देकर, रहते हैं जैसे हो अनजान।
https://ae-pal.com/
सुना है,बुढ़ापे की चोट दुखती बहुत हैं
जानते हैं सभी, फिर भी दिल दुखाते बहुत हैं।
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,26

नदी और समंदर

पितृ गृह से जब इक धारा संकरी चल कर आई
वन,उपवन,हिम पर्वतों से हुई उसकी यूँ विदाई
अनजानी मंजिल है उसकी और अपरिचित सी राह
दूर समंदर तकता रस्ता और आंखों में रौनक छाई।
https://ae-pal.com/
बूँद बूँद रिसती,है वो दुर्बल,निर्बल धारा
ऊंचे नीचे रस्ते,नपे-तुले पग धरती धारा
जाने कब अल्हड़पन इसमें भर आया है
दूर समंदर उसके इंतजार में जीता अपना जीवन सारा।
https://ae-pal.com/
लिखे गए अनंत गीत,नदियों के संघर्षों पर
मीठापन मिट जाने के, गृह के विछोह दर्दों पर
प्रकट नहीं कर पाया समंदर कभी अपने एहसासों को
लेकर लांछन खारेपन का,जीता है अनंत आस पर।
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,25

Blog at WordPress.com.

Up ↑