मानसिक आराधना



गर गंगा सा निर्मल जीवन हो जाए,शिव का मनहर स्नान हो जाएगा.
जीवनपथ पर स्वच्छ मार्ग दिखेगा,पग पग में शिव का साथ हो जाएगा.

कंटक सा मन,शिव को कभी ना भाता,राह का कंटक कभी न बनना.
स्वस्थ मन से सबका शुभ चाहा तो शिव को गोखरु स्वयं ही चढ़ जाएगा.

भंग घोट घोट ठंडाई बनी,भंग को शिव की अति प्रिय जान गटक न जाना
ग़र काम को नशे का जैसा पी सकें, स्वयं शिव उन्नति का पर्याय बनाएगा.
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बेलपत्र जब शिव को अर्पित करना, तन,मन,धन (पत्र)को साध कर रखना
स्वयं से परिचय हो गया तो शिव आत्मा के वृंत से सदा-सदा को जुड़ जाएगा.

शिव को बेर सा सादा फल भी है भाता,ज्यादा फीका कभी मीठा स्वाद चखाए.
जो बेरंग से जीवन में सुख दुःख से भेट कराए, शिव जीवन जीना सिखाए.

शिव को मानसिक व्रत से खूब नवांओ, स्नान, दान का चंदन लगाओ.
जीवन शिवमय हो, प्रपंच घेर न पाएगा, शिव घर घर में बस जाएगा.

नूतन प्रेम

मैंने यहाँ वहाँ संपूर्ण संसार में 
जीवन खो दिया उसकी खोज  में ।
आजकल कोई  उसे  जानता नहीं
उसे  व उसके स्पर्श पहचानता नहीं ।
अधिकांशतः
वह मिल जाता है,कभी राह  में
ऐसा होता  है सिर्फ़  स्वप्न   में ।
स्वार्थ  की  दुर्गन्ध  से लिप्त
खो गया किसी चौराहे  पर

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एक दिन
सिसकियाँ, कराहना सुना मैंने
लावारिस  पड़ा घाव देखता वह
मुझे बेबसी से उसने देखा
कहा ,
मुझे ही तुम खोजते हो ।
मैं ही प्रेम हूँ,
लावारिस हूँ।।
दिखावे के लिए मुझे सब अपनाते है
और स्वार्थ में अंधे हो
यहाँ  छोड़ जाते है।

अपर्णा शर्मा Feb. 21st,25 (पुनः प्रकाशित)

दिल की दास्तान



दिल के किसी कोने में महफ़ूज़ उसकी बातें,यादें मुलाकातें.
वो बिना ओर छोर की लगातार बातें, यादगार मुलाकातें.

अपने ही रंग तरंग में डूब लहराती, मचलती सी गुफ़्तगू.
मेरे हर सवाल को लाजवाब सा जवाब देती गुफ़्तगू.

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नजरो का नज़र से मिलने पर नजर चुरा कर देखती नज़रे.
पास आते ही रास्ता बदल दूर तक पीछा करती नज़रे.

सूखे फूल,तीन पत्ती, काग़ज़ के पीले पन्ने है जिंदगी की यादें.
खजाना खूब है पाया मोहब्बत में खो कर मिली है दर्द सी यादें.
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शरारतों से भरे दिन,एक चुप्पी को समझ बैठते थे
मुलाकातें.
पास से गुज़रे,जमघट में कभी उठते-बैठते, यही थी मुलाकातें.

सात पर्दों में छिपी, महफूज रखी है मैंने दास्तान.
मुमकिन नहीं पर यहीं है मोहब्बत से रीते दिल की दास्तान.

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