मन

है मन बावरा
मन बेचैन
तन में मन की
गहरी पैठ।
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कभी ज़मी पर
कभी फुनगी बैठे
किनारे तकता
मझधार में नाचे।

मन ही मन का मीत
बतियाए दिन और रैना
हर टेढ़े सवालों का
जवाब देता हरदम पैना।
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ख्वाबों में तैरे मन
दूर दूर तक सैर करे
यहीं मेरा एक मनमीत
जो चेहरे पर मुस्कान धरे।
अपर्णा शर्मा
Sept.29th,23

हार-जीत

गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
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सदा ही दो किनारों संग चली ये जिंदगी
जैसे कहानी में चलती है बात सच्ची और झूठी.
अंत तक नहीं पता,क्या सीखा रही बेरहम
हरा गई या जीता गई बहुरूपिया सी जिंदगी

अंत में, समझ इतना ही आया बस मुझे
हार और जीत संग-संग दिला गई मुझे
जब मंजिल मिली तो हार गया था सफर
सफर को हरा,मंजिल दिला गई जिंदगी।
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शिक्षा में जीता तो बचपन हार आया था
श्रेष्ठ जीवन हेतु,गाँव,संगी,सभी गवाया था
इस तरह शतरंज सी जिंदगी की हरेक शै याद आई
हार पर रोया, कभी जीत पर आँख भर आई।
अपर्णा शर्मा
Sept.15th,23

मनहर हिंदी

कंठहार सी मनहर हिंदी
भारत की पहचान है।
हर राज्य की भाषा से भी
न हिंदी अनजान है।

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बेशकीमती नगीने जैसी चमक
रही,हर क्षेत्र की भाषा है।
इनको एक सूत्र में हार बनाती
अपनी हिंदी भाषा है।

समाज में बोली जाती विभिन्न
प्रकार की भाषा।
देश प्रेम से ओतप्रोत कर देती
प्यारी हिंदी भाषा।

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औपचारिक भेंट में बोली जाती
अब अंग्रेजी भाषा।
सादा,सरल मिलन में खूब नेह
बरसाती हिन्दी भाषा।
अपर्णा शर्मा
Sept.14th ,23

(हिन्दी दिवस पर विशेष)

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