अनवरत इंतजार

किसी तरह रात को विदा कर के
दरवाजे खोल, दहलीज पर तड़के
छिड़क देती है,रोज पानी के छींटे
करती हैं वो रोज इंतजार।
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किवाड़ के पल्ले की ओट में
घोर रात में या उजली भोर में
सदा आशीष देती है मन मन में
करती है वो रोज इंतजार।

यद्यपि सामाजिक प्रतिष्ठा को
और पुत्र के उज्ज्वल भविष्य को
भेजा है परदेश टुकड़ा-ए- जिगर को
करती फिर भी रोज इंतजार।
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जानती है आगमन की तिथि हैं तय
जानती है समय करती व्यर्थ ही व्यय
फिर भी मन को बाँटकर देखती है बाट
करती हैं वो अनवरत इंतजार।
अपर्णा शर्मा
July26th,24

निगाहें बोलती हैं


जो सभी अनकही को जुबां दे जाती है
वो सारी बतकही निगाहों से हो जाती है।

ये नहीं कि सिर्फ मोहब्बत का इजहार करती हैं
खामोशी से हर बात से साफ़  इंकार करती हैं।
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ग़मों का सैलाब जो दिल में बाँध कर रखा था
ये पनीली निगाहें सारे दर्द को बयां करती हैं।

मेरी और उसकी और न किसकी किसकी कहे
ये बोलती निगाहें सभी की चुगली खूब करती हैं।
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यारों की महफ़िलों में जब हँसी मज़ाक सजते हैं
वहीं दो निगाहें चार हो कर नई दुनिया बसती है।

मैं जी रहा झंझटों में, वो भी कुछ झमेलों में फंसा है
जब मुस्कुराए,ये निगाहें तो जिंदगी आसान होती है।
अपर्णा शर्मा
July 19th,24

पदचिन्ह प्रेम के


घुँघरूओं की रूनझुन से दूर
प्रेम पदचिन्हों की छाप
मन आँगन के द्वार पर ली जैसे
नववधु के प्रथम पग की छाप।
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सहेज कर रखा है उसे
कोरे मन की श्वेत चादर पर
संदूक के कोने में समेट कर
दाग से बचा, सम्भाल कर।

प्रेम का विछोह,दर्शित है
उर्मिला के जीवन की सच्चाई में
प्रेम मात्र पाना नहीं, है खोना
खो जाना अनंत प्रेम की गहराई में
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प्रेम के चरण चिन्हों को
अपने मन मंदिर में सजाकर
और चरण वंदन करता रहूँ
जीवन के हर शुभ अवसर पर।
अपर्णा शर्मा
July18th,24

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