जड़ हुए शरीरों ने
समेट लिया कोलाहल
बंध खोलते मनों ने
अपना लिया सारा मौन।
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वचनों, वादों का संसार
शुष्क सा यथार्थ बन गया
इक दूजे से मिलन,भेंट
अब स्वपन सा हो गया।
वहीं मंदिर की चौखट
और नदी की बहती धारा
बदली सी बहकी अवस्था
दूर तक न दिखता किनारा।
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जड़ हुई इस दुनिया में
वृक्ष सरीखे मैं और तुम
मौसम सी आस लिए
और हमारा अनवरत प्रेम।
अपर्णा शर्मा August16th,24
खुशियाँ दिहाड़ी पर
ढेरों रोशनी छुपाए, पर टिमटिमाते हुए
शरमाते हुए, बैठ गई, सकुचाते हुए
बैठते ही,चहुँ ओर चमक दमक फैल गई
सजा दिया गया, स्थाई आसन उसके लिए।
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खबर उसके आगमन की, दूर-दूर तक थी
ढोलक की थाप और बधाई गाई जा रही थी
मिठाइयों संग, मेहमानों का लग रहा था मेला
उसके आगमन पर महफिल सज रही थी।
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सपने का साकार रूप, आँखें देख रही थी
सत्कार पा कर भी ,वो अपनी मजूरी पर अड़ी थी
खुशियाँ आई थी,मगर आई थी, वो दिहाड़ी पर
सुखद याद दे, खुशियाँ,अपनों से दूर जा रही थी।
अपर्णा शर्मा
Aug.9th,24
मन की बातें
मन में उठती आशंकाओं को
जब कहीं कोई पार नहीं मिल पाता है।
तब दुनिया में कोई एक अनोखा
सब कुछ बड़े धैर्य से सुन जाता है।
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नाते रिश्तों में मन की बातेँ
बिन विश्लेषण नहीं सुनी जाती हैं।
मन में उठी जटिल दुविधाओं पर
जम कर जग हँसाई हो जाती है।
याद आ रही आज बूढ़ी दादी
जो हरदम बुड़-बुड़ करती थी।
अपने से ही कह कर अपनी बातें
किसी को पता न देती थी।
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रोज शाम को पिताजी क्यूं
डायरी लिखते रहते हैं?
समझ आया, वो भी मन की बातें
कागज कलम से साझा करते हैं।
माँ तो माँ है,होती सबसे निराली
बालक को डांट कर जी हल्का करती है।
कुछ ज्यादा ग़र पूछ लिया तो
मार की धमकी भी वो देती है।
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मैं नादां इस सब गाथा से इतना
अब तक यहीं समझ में आए।
इक प्यारा सा दोस्त रखो जो
सुने, पर न कुछ अनुमान लगाए।
अपर्णा शर्मा
Aug.2nd,24
