होश संभालते ही, कुछ तस्वीरें बनी जेहन में
जिनमें रचा,पहाड़,झरने और चिड़िया बना मैं
थोड़ी सी ज़मी, जहाँ बैठ कर मैं रास्ते देख लूँ
थोड़ा सा आसमाँ,कि अपनी मंजिल ढूँढ लूँ।
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आसान सी सफर-ए-तस्वीर रखी दिल में
कठिन रही डगर-ए-तकदीर असल में
लगातार मंजिल को उठते रहे कदम
घुमावदार रास्ते थकाते रहे कदम दर कदम।
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आसमाँ की ऊँचाई पर,मंजिल कर रही इंतजार
झुका और,चल दिया खड़ी सीधी चढ़ाई पर
बस यहीं एक रास्ता लगा,जिंदगी के सफर का
सोचा मिली ग़र मंजिल,छू लूँगा दामन आसमाँ का।
अपर्णा शर्मा
Oct.11th,24
काश
बुनता रहा,ठहाकों की गूंज से खुशनुमा सी चादर
मुस्कानों से कढ़े बेल बूटे, बढ़ा गए अपनों का आदर
काश! स्नेह में भीगता ही रहता ये मन का आंचल।
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नाराजगी के दो शब्द चुभ गए दिल में,जो कील से
नफरत का ताबूत तैयार था उन शब्दों के स्मरण से
काश!वो कील से शब्द न होते कभी किसी वार्तालाप में।
चिंता के क्षणों में, समस्या की गठरी को फेंक आते
रोटी से रोटी की जंग,आसानी से यूहीं जीत जाते
काश! पैसे की दौड़ में, गर लालच की होड़ न पालते।
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यहीं सब दूर से ताकता,झांकता रहा ताउम्र
और कोशिश रही पढ़ लूँ मैं, चेहरों की दास्तान
काश! पारदर्शिता से भरा होता अपना आसमान।
अपर्णा शर्मा
Oct.4th,24
विरह वेदना
प्रेम, प्रीत में ऐसी डूबी
समय चक्र को थी भूली
प्रीति की अचल इच्छा में
जीवन की राह थी बदली।
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प्रेम की अमिट छाप लिए
विरह वेदना मन में लिए
विरह में यादों की बरसातें
प्रिय का हर क्षण ख़्याल लिए।
विरह से और गहराता प्रेम
चहुँ ओर छाया रहता प्रेम
भरमाया सा खोया सा मन
प्रतीक्षा में अब बढ़ता प्रेम।
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विरह आंगन बैठी,राह तके
प्रेम की बाती रोज ही जले
पूर्ण प्रेम की प्रतीक्षा में ही
राधा, उर्मिला सी दशा सहे।
अपर्णा शर्मा
Sept.27th,24
