घर-घर सजी,रंग रंगोली
हवा में,मादकता,छाई रे।
टेसु,गेंदा से भरी गागरी
मतवाली,होली आई रे
धीमे-धीमे,आया फागुन
होली ने,हल्ला बोला रे
रंग गए सबके,तन और मन
होली,सब की,हो ली रे।
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मुक्त मन से,खेली,जब होली
बंधन की बातें, बीती रे
इक दूजे के,रंग में रंग कर
सब पर,यौवनता छाई रे।
एक बावरा मन,खड़ा उदास
अंखियाँ तकती,देहरी रे
अंजुरी भर कर,लिया गुलाल
खुद ही,खुद को,रंगती रे।
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रंग बरसाते,हुर्रियारों की छाई
नगर,गांव में,मस्ती रे
बाट देखते, कहीं उजड़ गई
किसी की,अपनी हस्ती रे।
अपर्णा शर्मा
March14th,25
हे धरा!
हे धरा! सदा दात्री,अनुकम्पित कर
अबोध चित्त में संवेदना संचरित कर।
प्रथम ग्रास माटी ही धरी थी मुख में
आचमन जान,तूने भर लिया था अंक में।
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सर्वस्व दे ,पोषित हुआ तेरे आंचल में
रंगत जीवन की सब तेरे आशीष से।
निश्छल जान तू दात्री बनी रही
पुत्र के मान में, प्रभास खो रही।
मूढ़,अज्ञानी,हे वसुन्धरे! शोषित करता रहा
ग्राही ऐसा हुआ कि स्व कर्तव्य न समझ रहा।
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धन्य है माँ,तू स्नेह लुटाती स्वार्थी पुत्र पर
सर्वरंग से श्रृंगार करूंगा कर्तव्य मान कर।
तेरे आंचल की छाया तले बढ़े तेरे वक्ष पर
संरक्षित होगी तू, विश्वास रख इस सुबोध पर।
अपर्णा शर्मा
March,7th,25
छुपाए है एहसास
छुपाए है एहसास कि नहीं,समझती है दुनिया।
दिखाए जो जज़्बात तो भी,हँसती है दुनिया।
छुपाए है जज़्बात, यूँ खिलखिला कर
छुप गई पर्दों में, खुद ही,शरमा कर
हर हाल में कहानियाँ,गढ़ती है दुनिया
छुपाए है एहसास कि नहीं,समझती है दुनिया।
लहरों में नाचती सी वो,हलके से मुस्कुराई
ओढ़ मुहब्बत का दामन, खुद में सिमट आई
हाल -ए-दिल में उसके कहाँ,उलझती है दुनिया
छुपाए है एहसास कि नहीं,समझती है दुनिया ।
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सुर्ख चेहरे ने मुहब्बत की,बयां की चुगली
छिपा के नज़रे गेसूओं से,अपनी,चाहत ढकली
हो जाए गर शक तो तफ़तीश, करती है दुनिया
छुपाए है एहसास कि नहीं,समझती है दुनिया।
आसां नहीं दौर-ए-नफरत में, इज़हार करना
छिपाने के अंदाज़ को,अदा में बदलना
अदाओं पे भी तो ताना,कसती है दुनिया।
छुपाए है एहसास कि नहीं, समझती है दुनिया।
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वक़्त की रवानगी में, छिप गए एहसास
फर्ज़ की ज़मी पे, वो,चुप सी उदास
कब्र पर फूल रखे कि, रिवाज कहती है दुनिया।
छुपाए है एहसास कि नहीं, समझती है दुनिया
अपर्णा शर्मा
Feb. 28th,25
