स्त्री

क्षुद्र सी आकांक्षा हेतु,वो हटाती पत्थर
विशाल स्वप्न हेतु,वो महत तोड़ती पत्थर।
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कभी प्रस्तर हृदयों को,तराश बनाती स्नेही
मार्ग अवरुद्ध करते प्रस्तरों में,बन जाती राही।

विश्वस्त है,एक दिन खण्डित पत्थर ही राह बनेंगे
उज्ज्वल भविष्य के,निश्चय ये भी भागीदार बनेंगे।
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वो तोड़ती पत्थर,निरंतर युगों युगों से
अविरत प्रयास में,जुटी संपूर्ण हृदय से।
अपर्णा शर्मा
April 4th,25

लॉकडॉउन डायरी से

ऑनलाइन क्लास में
मुझको कुछ न भाता है।
सुबह सवेरे अलसाया सा
मुझको फोन उठाता है।

ड्रेस पड़ी अलमारी में
किताबें बस्ते में सोती हैं।
बिन दैनिक क्रिया के ही
मेरी क्लास होती है।
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सारा दिन मैं पढ़ता हूँ
ऐसा माँ समझती है।
सारी पढ़ाई, मैं ही जानू
सर पर से गुज़रती है।

मास्टर जी मेहनत कर
अपना विषय पढ़ाते हैं।
पर ऑनलाइन क्लास में
हम कुछ समझ न पाते हैं।
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अब इन लंबे इतवारों से
मैंने तौबा करनी है।
बस स्कूल खोल दो मेरे
मुझ को पढ़ाई करनी है।
अपर्णा शर्मा
March28th,25

विस्मृति

अर र र पहचानो ये क्या हो रहा है
अर र र संभाल लो ये क्या हो रहा है।

चलते चलते अचानक रुक जाता हूँ
बोलते बोलते बातों में बहक जाता हूँ
सोचता हूँ बहुत,कि सब भूल जाता हूँ
अर र र बताओ थोड़ा रुका हूँ या थका हूँ।

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गणित के सवाल अब पढ़ नहीं पाता
सवाल का जवाब अब बनाया नहीं जाता
शब्द और भाव जाल में अक्सर फंसता हूँ
अर र र बताओ! कठिन है सब या हैरान हूँ।

बच्चों के संग,खुद को वरिष्ठ समझ बैठा
वरिष्ठ समूह में, बिल्कुल ही नादान  दिखा
धमाल भी न कर सका,न संजीदगी से जिया हूँ
अर र र बताओ! क्या जिंदगी को समझ न सका हूँ।

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कभी-कभी भूलों को पहचानने की कोशिश में
उलझा रहता हूँ अपनी ही रची कशमकश में
उम्र के नहीं, काम के बोझ के कारनामों में दबा हूँ
अर र र बताओ! क्या विस्मृत सा स्मृतियों में जी रहा हूँ।
अपर्णा शर्मा
March21st,25

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