घन-घनाते घिर आए बदरा
तपती धरा को भाए बदरा
तरसे धरती, तरसे प्रकृति
कब बरसेंगे ? काले बदरा।
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टीटहरी की अब एक ही टेर
मोर को नाचने में हो रही देर
दादूर बाहर आने को व्याकुल
कब बरसेंगे ? काले बदरा।
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सूखी अंखियन,पी की प्यासी
खेती सूखी, बिन पानी सारी
गांव,शहर सब बिन पानी सूखे
कब बरसेंगे ? काले बदरा।
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जागी, पुरवाई से आस बड़ी
बीती गई अब आधी आषाढ़ी
धरे ओसारे , उपले,लक्कड़
कब बरसेंगे ? काले बदरा।
कब बरसेंगे ? आस के बदरा।
अपर्णा शर्मा
June27th,25
समय अनमोल
उत्तम समय प्रिय आशीष सा.
अधम समय अभिशाप जैसा।
समग्र प्रकृति समय के निहित.
कालचक्र सी निरंतर चलित।
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समय धन ही सबसे अनमोल.
क्रय न होता किसी भी मोल।
समय की गति का रखा जो मान.
समय बना उत्तम,बना भाग्यवान।
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समय को कभी न करना नष्ट.
रुष्ट समय करता जीवन नष्ट।
समय को बनाओ सदा उपयोगी.
पाओ जीवन में जो मन में सोची।
अपर्णा शर्मा June 20th,25
दिल
अनुराग संगीत का पान कर
बजता रहे जब उसमें गीत मधुर
नाचता है होकर वो अलमस्त
यूँ चहकता खूब है दिल.
समीर मंद सी बहें, प्रीत की
सुरभि हो, शहद, गुलकंद की
फूस, जेठ के शीत,ताप से परे
यूँ महकता खूब है दिल.
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प्रीत की बारिशों में भीगा
जलबिंदुओं को मोती समझता
प्रेम वर्षा में पूर्ण भीग कर
यूँ स्वर्ण सा चमकता है दिल.
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कनक ताप में तप कर
तपिश को स्वीकार कर
क्षणिक मुश्किलों को समझ
यूँ तपता है प्रेम ज्वर में दिल.
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गर कभी,
नफरतों से हो सामना
अग्नि बाणों सा बरसता
प्रत्यंचा खींचकर,क्रोध चाप की
फिर यूँ तमकता है दिल.
अपर्णा शर्मा
June 13th,25
