भंवर

जीवन रूपी भंवर से, कोई निकल न पाए
आस लगे उबरने की, त्यों-त्यों फंसता जाए।

नदियों के गहरे भंवरों से,कब का बचना सीख गया
पर जीवन के मोह भंवर में,खुद ही जाकर फिसल गया।
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असीम आकर्षण होता इस भंवर में, आकर्षित कर ही लेता है
पास जाए बिन,मन न माने और ये अपनी बाहों में भर लेता है।

भंवर चक्र में, फंसकर मानव, खूब चक्र सा घूमे
प्रेम-पाश में फंसकर, फिर वो, अपना लक्ष्य भूले।
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सारी शक्ति, तिल-तिल कर,इसी भंवर में सोखी जाती
कैसे कर ? बाहर निकलूँ , कोई चाल समझ न आती।

मोह का भंवर जब शांत हो,ऊर्जा कुछ न बचती
बाहर अगर आ गया,तब तक,जीवन टूटी नैया होती।
अपर्णा शर्मा
August 8th,2025

बचपन और खेल

बचपन के खेल निराले
कभी पानी में नाव तैरातें
बेमतलब की दौड़ लगा कर
रेत के फिर घर बनाते।
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अपने घर के अभियंता बनकर 
वास्तुकार सा सुन्दर घर सजाकर
चेहरे पर खिलती मोहक मुस्कान
अब घर बिल्कुल बनकर हुआ तैयार।

बचपन देखे, जहाँ रेत का टीला
पानी डालकर करता उसको ढीला
न कोई नींव,न उसको कोई ज्ञान
और भरभरा कर गिरती गृहशाला।
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तब बचपन को लगता पहला धक्का
दुनिया क्षणभंगुर,कुछ न पक्का
भाई, बहन और घर का संग भी
सब कच्चा,बस सबमें प्रेम ही सच्चा।
अपर्णा शर्मा
August,1st,2025

मनभावन ऋतु

आह कैसी मनभावन ऋतु है आई
सावन के बरसने की ऋतु हैआई।

लगती कभी गर्म, कभी सुहानी
ऐसी हवा चली, मद-सी मतवाली।
पुरवा के संग में खूब इठलाती
कभी बिन हवा, स्वेद बढ़ाती।
आह कैसी मनभावन ऋतु है आई
सावन के बरसने की ऋतु हैआई।
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दमकती है धूप, कभी होती छांव
समझ न आते, कभी इसके दांव।
फूलाती सबके, हरदम हाथ पांव
लुका छुपी में बीतते ऐसे दिन रात।
आह कैसी मनभावन ऋतु है आई
सावन के बरसने की ऋतु हैआई।

घेवर, गुझियों से सजे बाजार
चूड़ी,मेहंदी से हरा भरा श्रृंगार।
झूला झूले और गाए गीत मल्हार
बेटी सखियों का मिलन त्योहार।
आह कैसी मनभावन ऋतु है आई
सावन के बरसने की ऋतु हैआई।
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शिव की स्तुति, गौरा का ताप
प्रेम,आस्था का अटूट विश्वास।
विरह कहे या कहे मधु_मास
बम बम भोले गूंजे हर श्वास।
आह कैसी मनभावन ऋतु है आई
सावन के बरसने की ऋतु हैआई।
अपर्णा  शर्मा
July 25th,25

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