शब्दों का उपवन

शब्दों के मनहर उपवन में
जब पुष्प खिले हो भावों के
छंदो के कोमल वृअंतों पर
तब अर्थ हिलोरें लेते हैं।

भीगे अंतस जब मधुरस से
पोर पोर तक युवा रचना से
ताजापन बिखरे छंद छंद पर
शब्द संयोजन झोंके लेते है।
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कभी-कभी तीखे कन्टक से
हृदय में धँसते जो शूलों से
वो नागफनी से है, बगीचे में
जो उत्तम पाठ पढ़ाते हैं।

कोमल,कोमल, छितरे, छितरे
शब्द उपवन में बिखरे,बिखरे
अमलतास सी रचना बनकर
शब्द उपवन को रोशन करते हैं।
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ऐसे ही शैली के पारंगत कवि
अपनी रचनाओं की लेकर छवि
गीतों को दिल तक पहुंचाकर
शब्द उपवन में महका करते हैं।
अपर्णा शर्मा
March27th,2026

अनकही बातें

ज्यों ज्यों जिंदगी बढ़ रही
अकेलेपन को समझ रही
त्यों त्यों बहुत सी अनकही
अपनी अपनी ही कह रही।

कुछ बातें जो नुक्कड़ पर छोड़ी
कुछ बड़ी खूबसूरती से थी मोड़ी
अब सभी आवाज देकर बुलाती
आज भी वो उसी जगह थी ठहरी।
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अंधेरा और अकेलापन इन्हें खूब भाता
अनकहे किस्सों का डेरा जम ही जाता
वो लम्हा ,सुकून का पल दे कर
अनकहा संतुष्ट सा फिर नजर आता।

कभी महफ़िलों के बेहद शोर में 
कह दिए गर ये अनकहे किस्से
रूठ कर दूर बैठ जाते हैं ये हमसे
जैसे पराए हो गए हों अब किस्से।
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अनकहा कभी कभी चुभता है दिल में
एक मुलाकात का फासला रहता है दिल में
हो मुलाकात और कह दे सब अनकही बाते
ठिठक कर घर कर गई है जो मन में।
अपर्णा शर्मा
March 20th,2026

ख्वाबों का जंगल

एक सुनहरी पगडंडी पर
निकला था वो सकुचा कर
ख़्वाब बसे थे उस रस्ते
चलता था वो इतरा कर।

धीरे-धीरे ख्वाबों के भी
उपजे थे उसमें अंकुर भी
ख्वाबों की नाजुक कोंपल सी
बसी थी दुनिया अंतरंगी सी।
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डगमग डगमग चलता जाता
ख़्वाब वनों का बसता जाता
कभी बसंत सा, कभी हेमंत सा
उसका ख़्वाब निखरता जाता।

घने ख़्वाब के जंगल में
खोया था अपनी ही धुन में
तभी जेहन में बिजली कौंधी
बहुत दूर था अपनों से।
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हर ख़्वाब पर फूल खिले थे
फूलों की खुशबू से महके थे
कीमत उसने बड़ी चुकाई
सारे ख़्वाब सच करने में।
अपर्णा शर्मा
March13th, 2026

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