नादानी

जिनका हाथ थामे बैठे थे, जिंदगी के अंधेरों में
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वो पंछी बन उड़ चले, जिंदगी के उजालों में.
अपर्णा शर्मा
July 29th,25

कुतुबखाना

कुछ किताबें, जो समझ में न आई थी उन्हें सहेजते रहे
कुछ किताबें, जो पसंद आई, उन्हें यूहीं जमा करते रहे।
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ऐसे ही कुछ किताबे है ,जो यदा कदा मिलती रही तोहफे में
इस लत-ए-जमा को, कमाल-ए कुतुब खाना कह रहे। (*कुतुबखाना- library )
अपर्णा शर्मा
July 15th, 25

बोझ

हल्के ,फुल्के, भरे गुब्बारे से
जो जीवन रंगते, मधुर सपने।
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जाने कैसे, काँधे पे आ बैठे
बोझ सरीखा,अब खींच रहे।
अपर्णा शर्मा
July8th,25

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