हाथों की लकीरें सहला रहीं,दबी छुपी मासूमियत को
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महसूस कर रही है, एक उम्र दांव पर लगी है तजुर्बे को।
अपर्णा शर्मा Nov.21st,23
हाथों की लकीरें सहला रहीं,दबी छुपी मासूमियत को
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महसूस कर रही है, एक उम्र दांव पर लगी है तजुर्बे को।
अपर्णा शर्मा Nov.21st,23
गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
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जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
अपर्णा शर्मा
Nov14th,23
नादां हवा को ना जाने क्यों गुमाँ हो गया है चिराग बुझाने का।
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उसे इल्म नहीं कि बाती में रोगन आज भी है मोहब्बत का।
अपर्णा शर्मा
Nov.7th,23