किसने कहा, कि त्योहार केवल इंसान ही मनाते हैं
उनके संग संग घर के दर –ओ–दीवार भी मुस्कुराते हैं
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त्योहार गुजरते ही,जब इंसान निकल जाते है अपनी कर्मभूमि को
मायूस घर,दूसरे त्योहार के इंतजार में, वहीं खड़े रह जाते हैं ।
अपर्णा शर्मा
March26th,24
सफ़र
जिंदगी का सफर,रेल के सफर सा अस्थिर होता है
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दोनों का सफर से ठीक पहले प्लेटफॉर्म बदल जाता है।
अपर्णा शर्मा
March19th,24
घरौंदे
चारों ओर दिखते हैं, मतलब से लबालब स्वार्थ के रिश्ते।
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बुजुर्ग आँखें जानती है, रेत सी जिंदगी में रेत के घरौंदे।
अपर्णा शर्मा
March12th,24
