इज़हार

जब शब्द मौन हो जाए,

तब आँखें बात करती है।

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सुप्त पड़ी सम्वेदना का ,

खुलकर इज़हार करती है।

दस्तक

फिर दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी है

ख़्वाबों ने हक़ीक़त को आवाज़ दी है

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खुले रास्ते अब बढ़ते जाना सिखा रहे हैं

हम भी मंज़िल से बेफिक्र, चले जा रहे हैं। (अपर्णा शर्मा)

काश

जब गम बढ़ जाए, आँखे नम हो जाए,

काश, तभी चुपके से बारिश हो जाए।

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न गम दिखे, न आँखे नम दिखे,

जिसे दिखे बारिश और बारिश दिखे। अपर्णा शर्मा(Nov.8th,22)

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