चार सलाई बुनकर दो सलाई उधड़ती जा रही है ज़िंदगी।
ऐ ज़िंदगी! लिहाज़ कर, संवर जा, छोड़ दे ये दिल्लगी।
चार सलाई बुनकर दो सलाई उधड़ती जा रही है ज़िंदगी।
ऐ ज़िंदगी! लिहाज़ कर, संवर जा, छोड़ दे ये दिल्लगी।
जब-जब मोह हुआ माया से,
तिलिस्म का संसार खड़ा हुआ।
जब-जब भान हुआ सच का,
तिलिस्म तो ताश का महल हुआ।
आँसुओं को सिर्फ़ अपनों के लिए पी लीजिए
मुस्कान को खुलकर ज़माने में बिखेर दीजिए।
गर मिले कोई सच्चा हम-मीत ज़िंदगी के सफ़र में
तो कांधे पर सर रखकर आँसू भी बहा दीजिए।