सोच

बेटे -बेटियाँ दोनों खुद के आशियाँ बसा लेते हैं
अपने -पराए से परे अपने आसमाँ खुद तलाशते हैं।

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दोनों के ही अपने बेहतरीन वज़ूद सदा से रहे हैं
अधिक और कमतर बस सोच के ही मामले हैं।

ख़्वाहिश

ख़्वाहिश, कभी अंगड़ाई, कभी परछाई, कभी मुस्कराती

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कभी पूरी, कभी अधूरी, कभी जिम्मेदारियों में कुनमुनाती।

कोशिश

अनंत तक, कोशिशें जारी रहे, कि द्वेष भाव, स्नेह बन जाए।

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अंत तक, कोई कोशिश न हो, कि प्रीत भाव, बैर बन जाए।।

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