हम तो अपनी ही ‘मैं’ में इस कदर जिए जा रहे हैं
बहुत पड़ा है जीवन,सोचकर ‘मैं’ में इठलाए जा रहे हैं।
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आजकल वो सबसे कह रहा, मुझमे मेरी ‘मैं’ बोलती है
‘मै’, तो ‘मैं’ है,अपनी ‘मैं’ रहती, किसी को कुछ नहीं समझती है।
अपर्णा शर्मा
July 16th,24
बोलती हैं निगाहें
झिलमिलाते सपनें
उठती चाह की लहरे
बजती शहनाईयां
और संगीत के तराने।
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नाचते तुम हम
कैसे देखूँ इन्हें
सुनूँ कैसे बतकही
समझे सभी अनकहे।
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नहीं जानती तरकीबे
और ना ही तौर तरीके
बस अपने को समेटते
ये बोलती है निगाहें।
अपर्णा शर्मा
July 9th,24
ख़ामोशियां
अंदेशे का शिकार होती हैं ख़ामोशियां
एक तरफा शिकायत होती है ख़ामोशियां।
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कहते हैं आते तूफ़ाँ की पहचान होती है ये
बड़े ज़ख्मों के लिए तैयार करती हैं ख़ामोशियां।
अपर्णा शर्मा
July 2nd,24
